भुलाए नहीं भूलतीं अटल से वो मुलाकातें, एक नहीं सैकड़ों लोगों के दिलों में आज भी ‘अटल’ हैं वाजपेयी

जन्मदिन तो पिछली बार भी स्व. अटल का जयंती के रूप में मना था। इस बार भी मनने जा रहा है। तब लगभग सवा चार महीने हुए थे और अब लगभग सवा 16 महीने। पर, अटल हैं कि लोगों को भुलाए नहीं भूलते। प्रदेश में एक नहीं सैकड़ों लोग ऐसे हैं जिनके दिल में वाजपेयी आज भी ‘अटल’ हैं। किसी के दिलोदिमाग पर अटल का अंदाज-ए-बयां छाया है तो किसी केदिल में अमीनाबाद में शंभू हलवाई की दुकान पर मलाई खाने के दौरान अटल की मुलाकात की यादें ताजा हैं।

भाषण दिलाओगे तो शरबत कौन पिलाएगा
50 के दशक की बात होगी। अमीनाबाद में शंभू हलवाई की दुकान पर अटलजी से मुलाकात हुई । वह उस समय कृष्णगोपाल कलंत्री के यहां मारवाड़ी गली में रहा करते थे। नगर महापालिका का चुनाव था। अटलजी जनसंघ के उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे थे और मैं कांग्रेस का। एक लाउडस्पीकर कलंत्री जी के आवास पर और दूसरा नजीराबाद में एक होटल के ऊपर लगा था। पहले दिन की बात है। वह टहलते हुए आए और बोले, ‘चलो! सुंदर की दुकान पर शरबत पीकर आते हैं।’

एक दिन उन्होंने कई बार शरबत पिया। मैंने पूछा, ‘क्या बात है? आज कई बार शरबत।’ हंसते हुए बोले, ‘अरे भाई! तुम्हारी तरफ तो कई लोग हैं। इसलिए बोलते-बोलते किसी का गला नहीं सूखता। पर, मुझे तो अकेले ही बोलना है। जब कई बार बोलने को मजबूर करोगे तो शरबत कौन पिलाएगा।’ यह कहते हुए उन्होंने मेरे हाथ पर हाथ मारते हुए जोर का ठहाका लगाते हुए कहा, ‘कम बोलो या शरबत पिलाओ।’ लगता है कि आज भी कानों में उनकी वह हंसी गूंज रही है।

एक दिन उन्होंने कई बार शरबत पिया। मैंने पूछा, ‘क्या बात है? आज कई बार शरबत।’ हंसते हुए बोले, ‘अरे भाई! तुम्हारी तरफ तो कई लोग हैं। इसलिए बोलते-बोलते किसी का गला नहीं सूखता। पर, मुझे तो अकेले ही बोलना है। जब कई बार बोलने को मजबूर करोगे तो शरबत कौन पिलाएगा।’ यह कहते हुए उन्होंने मेरे हाथ पर हाथ मारते हुए जोर का ठहाका लगाते हुए कहा, ‘कम बोलो या शरबत पिलाओ।’ लगता है कि आज भी कानों में उनकी वह हंसी गूंज रही है।

पढ़ाया जिंदगी का फलसफा
मेरी अटल जी से पहली मुलाकात 71 में हुई। अटल जी के बुआ के लड़़के पं. जगदीश चंद्र दीक्षित सीतापुर से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। उनके चुने जाने के बाद हम लोग अटलजी से मिलने गए। काफी अपनत्व से मिले। बोले, ‘ध्यान रखना कि सार्वजनिक जीवन में विश्वसनीयता, ईमानदारी और परस्पर सौहार्द से बढ़कर कुछ नहीं है।’ अटलजी की और हमारी मुलाकातें लगातार होती रहीं।

एक बार मैं पत्नी जाकिया और बेटे सुलेमान के साथ लंदन से वापस आ रहा था। अटलजी संयोग से उसी विमान में थे और मेरी व उनकी सीट अगल-बगल थी। उन्होंने सुलेमान से पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछा। सुलेमान ने इतिहास की पढ़ाई की बात बताई। अटल जी मुझसे बोले, ‘आप पीछे बहू के साथ बैठें मैं साहबजादे के साथ बात करूंगा।’ वह रास्ते भर सुलेमान से इतिहास पर चर्चा करते रहे। जैसे कोई अपने हम उम्र से बात कर रहा हो।

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