महाभारत से जुड़ा है मकर संक्राति का पर्व, जानिए ख़ास रहस्य

हर साल आने वाली मकर संक्राति इस साल 15 जनवरी को मनाई जाने वाली है. वहीं दक्षिण भारत में इस पर्व को पोंगल के रूप में मनाया जाता है और उत्तर भारत में इसे खिचड़ी, पतंगोत्सव या मकर संक्रांति के रूप में मनाते हैं. इसी के साथ कई जगहों पर इसे उत्तरायन कहते हैं. आपको बता दें कि मकर संक्रांति का अद्भुत जुड़ाव महाभारत काल से है और ऐसी मान्यता है कि कई दिनों तक बाणों की शैय्या पर पड़े रहने के बाद इसी दिन भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर अपना देह त्यागा था. जी दरअसल, भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था इस कारण से अर्जुन के बाणों से बुरी तरह चोट खाने के बावजूद वे जीवित रहे थे.

वहीं महाभारत के युद्ध में भीष्म 10 दिनों तक कौरवों के सेनापति रहे थे और लगातार पांडव की सेना का संहार कर रहे थे. इसके बाद में पांडवों ने शिखंडी की मदद से भीष्म को धनुष छोड़ने पर मजबूर किया और फिर अर्जुन ने एक के बाद एक कई बाण मारकर उन्हें धरती पर गिरा दिया था. कहते हैं भीष्म पितामह ने ये प्रण ले रखा था कि जब तक हस्तिनापुर सभी ओर से सुरक्षित नहीं हो जाता, वे प्राण नहीं देंगे. इतिहास में प्रचलित एक कथा के अनुसार, ”भीष्म पितामह पूर्व जन्म में एक वसु थे. वसु एक प्रकार के देवता ही माने गए हैं. वसु ने ऋषि वसिष्ठ की गाय चुरा ली थी. इसी बात से क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें मनुष्य रूप में जन्म लेने का शाप दिया था.

भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तराय का महत्व बताते हुए कहा है कि 6 मास के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और धरती प्रकाशमयी होती है, उस समय शरीर त्यागने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता है. ऐसे लोग सीधे ब्रह्म को प्राप्त होते हैं. यही कारण भी है कि भीष्म पितामह ने शरीर त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायन होने तक का इंतजार किया.” पौराणिक कथा की माने तो, ”इसी दिन गंगाजी भी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर और कपिल मुनि के आश्रम से होती हुईं सागर में जाकर मिल गई थीं.”

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