शब्बे बारात याने वो दिन जबकि इस्लाम धर्मावलंबी यह मानते हैं कि.. यह रात वो रात है जबकि दुनिया से जा चुके मोमिन इस रात बाहर आते हैं.. और मुस्लिम उनसे मिलने क़ब्रिस्तान जाते हैं, और उनकी शांति के लिए फ़ातिहा पढ़ते हैं.. उन मरहूमों को याद करते हैं.. यह कुछ वैसा ही है जैसे कि सनातन धर्मियों में पितृपक्ष कि तिथी का मसला होता है। पर इस बार यह फ़ातिहा और मरहूमों को याद अंबिकापुर के मुस्लिम घर से ही करेंगे।
शब्बे बारात पर बंद रहेगा क़ब्रिस्तान.. फातिहा और पूर्वजों को घर से करें याद
