रायपुर, 29 जून 2020


एक पंथ दो काज यानि एक कार्य से दो लाभ प्राप्त होना। यह मुहावरा तो हम सबने कभी न कभी सुना ही है, लेकिन एक पंथ तीन काज की बात शायद ही किसी ने सुना या देखा हो। इसे छत्तीसगढ़ राज्य के मर्राकोना गांव में जाकर देखा और समझा जा सकता है। मुंगेली जिले के पथरिया विकासखण्ड के इस गांव के आश्रित ग्राम पीपरलोड़ में पंचायत ने साल 2018-19 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत फलदार पौधरोपण कराया था। इसके अंतर्गत दो हजार अमरुद के पौधे रोपे गए थे, जो आज दो साल बाद बगीचे का रुप ले चुके हैं। पंचायत का यह कार्य आज सभी के लिए एक मिसाल बन गया है।

पंचायत के द्वारा महात्मा गांधी नरेगा से किए गए इस काम से गांव की 3.34 एकड़ सरकारी जमीन अतिक्रमण से मुक्त हुई साथ ही फलदार पौधरोपण से गांव का पर्यावरण भी हरा-भरा हो गया है। वहीं यह ग्राम पंचायत की आय का जरिया भी बनने जा रहा है।
ग्राम पीपरलोड़ में महात्मा गांधी नरेगा से दो साल पहले लगभग तीन एकड़ से कुछ अधिक की शासकीय भूमि में 2 हजार अमरुद के पौधों का रोपण किया गया था। इस काम में 25 ग्रामीण परिवारों को सीधे रोजगार मिला। पौधों की सुरक्षा एवं संवर्धन के लिए यहां पूरे क्षेत्र की तार से फेंसिंग की गई। ग्राम पंचायत ने 14वें वित्त आयोग की राशि से अभिसरण करते हुए यहां नलकूप कराकर पौधों के लिए पानी की व्यवस्था भी की।
मर्राकोना पंचायत की सरपंच श्रीमती फुलेश्वरी मरकाम बताया कि पंचायत के लिए गाँव की शासकीय भूमि को अतिक्रमण से बचाना सबसे बड़ी चुनौती रहती है। इसे देखते हुए ही पंचायत ने महात्मा गांधी नरेगा योजना के माध्यम से पौधरोपण कर इसे सुरक्षित करने का फैसला लिया था। इस फैसले के तहत योजनांतर्गत 12 लाख 93 हजार रुपये की लागत से अमरुद के पौधों का रोपण कराया गया। जनभावना के अनुरुप पंचायत ने इसे महात्मा गांधी अमरुद वाटिका का नाम दिया है।
सरपंच श्रीमती मरकाम ने बताया कि मुख्य मार्ग के किनारे और आवास मोहल्ला के पास लगाए गए अमरुद के पौधे अब बिही बगीचा का रुप ले चुके हैं। यह पौधरोपण जिसे कभी कोई अमरुद वाटिका कहता है, तो कभी कोई बिही बगीचा के साकार होने के पीछे सक्रिय जनभागीदारी का होना है। नियमित देखभाल के कारण पौधरोपण के दो साल बाद आज सभी पौधे जीवित हैं। उन्नत किस्म के पौधे होने के कारण दूसरे साल में ही इनमें फल आने लगे हैं। यह पंचायत के लिए आय का साधन बन गया है। पंचायत यहां स्व-सहायता समूहों को अंतर्वर्ती फसलों के रुप में सब्जियों के उत्पादन के लिए प्रेरित करने की योजना बना रही है। जिससे गांव की महिलाओं को स्व-रोजगार का साधन मिल जाएगा और पौधरोपण की नियमित देखभाल भी होती रहेगी।
