नेत्रहीन पिता के लिए श्रवण कुमार बनीं नेहा, भाई-बहनों के सपनों में भी भर रहीं रंग

ज्ञानपुर। जिंदगी में उलझनों से टूटकर बिखरने के बजाए अगर चुनौतियों का सामना किया जाए तो संघर्ष की मिठास से जिंदगी नए सपने बुनती है। हमारे गांव-गिरांव और आसपास महिलाओं और बेटियों के साहस की ऐसी कहानियां बिखरी पड़ी हैं, जो समाज की आम बेटियों और महिलाओं के लिए उदाहरण हैं। इसी फेहरिस्त में एक नाम शामिल है जमुनीपुर अठगवां की नेहा का।

जिले के सुरियावां विकास खंड के जमुनीपुर अठगवां गांव की दलित बस्ती की नेहा हमारे समाज के लिए मिसाल है। सात साल पहले नेहा की मां की मौत हो गई। इसके बाद उसका जीवन संघर्ष शुरू हो गया। महज 16 वर्ष की उम्र में नेत्रहीन पिता के साथ भाइयों और बहन के लिए मां-बाप की जिम्मेदारी उठानी पड़ी। मां की मौत के बाद हौसला नहीं खोया। परिवार के पालन के लिए खुद मजदूरी की और भाई-बहन के सपनों में रंग भरा।
नेहा मजदूरी के जरिए न सिर्फ उनकी परवरिश करने में जुट गई, बल्कि खुद भी बीएससी करने के बाद बीटीसी कर रही है। मौजूदा समय में वह भाई-बहन को पढ़ा-लिखा कर आगे बढ़ाने में जुटी है। नेहा मुश्किल भरे हालात में खुद राह निकालती आई है। दोनों आंखों से नेत्रहीन पिता सुरेंद्र, छोटे भाई अंकित और बहन शिल्पा की परवरिश और सेवा का पूरा जिम्मा नेहा के कोमल कंधे उठा रहे हैं। नेहा की जिंदगी बेहद चुनौतीपूर्ण है। पैसे के नाम पर उसके पास कुछ नहीं है। खेतों में काम कर वह अपने परिवार गाड़ी खींच रही है।

 

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