छत्तीसगढ़ के ये 33 गांव, आज भी बैलगाड़ी से सफर करने को मजबूर

बीजापुर। जिले का एक ऐसा इलाका जो विकास से कोसों दूर पीछे छूट चुका है। जहां आज भी लोग बस या टैक्सियों से नहीं बल्कि बैलगाड़ियों के सहारे ही सफर करने को मजबूर हैं। जिले के चार पंचायतों के 33 गांव ऐसे हैं, जहां 90 फीसदी लोग आवागमन की बाधा के चलते राशन नहीं उठाते। 35 किलो चावल के लिए पहले तो इन्हें 35 रूपये राशन दुकान में अदा करना पड़ता है, परंतु उसके बाद अपने घर तक पहुंचाने के लिए उन्हें एक पैकेट चावल के पीछे 200 रूपये किराए बैलगाड़ी मालिक को देने पड़ते हैं, जिसके चलते ग्रामीण खाद्यान्न उठाने से कतराते हैं।

सेण्डरा अकेला पंचायत नहीं है जो इस त्रासदी से जूझ रहा है, इस इलाके में बड़े काकलेर, एड़ापल्ली और केरपे भी ऐसी पंचायतें हैं, जिनकी आबादी करीब साढ़े पांच हजार से अधिक है, जो शासन की महत्वाकांक्षी योजनाओं से दूर आदिम युग में जीने को मजबूर हैं। अपनी रोजमर्रा की सामग्री के लिए महाराष्ट्र को ही अपना अन्नदाता मानते हैं।

2799.08 वर्ग किमी के क्षेत्रफल में बसे चार पंचायत, 33 गांव की साढ़े पांच हजार की आबादी को सरकार ने करीब पंद्रह साल पहले ही भुला दिया। इन पंचायतों के सभी राशन दुकान भोपालपट्नम में विस्थापित किए गए हैं। जहां तक पहुंचने के लिए इलाके के ग्रामीणों को बैलगाड़ी के सहारे तीन दिन का सफर तय करना पड़ता है।

एक रूपए किलो का यह चावल ग्रामीणों को करीब दस से बारह गुना महंगा पड़ जाता है। पटेल इस्तारी मड़े और ग्रामीण बण्डे राम बताते हैं कि उन्हें राशन दुकान से जो चावल प्राप्त होता है, उसे लेने के लिए उन्हें तीन दिन का राशन लेकर चलना पड़ता है। इन कठिनाइयों से बचने के लिए इलाके के 90 फीसद ग्रामीण राशन नहीं उठाते।

कई परिवार राशन कार्ड से वंचित

सेण्डरा निवासी चिरेम चिन्ना, मेट्टा इरिया और गुरला गनपत बताते हैं कि वे पिछले कई साल से गांव में ही राशन दुकान संचालन की मांग करते आ रहे हैं, जिसके लिए वे गांव तक सड़क को दुरूस्त करने के लिए भी तैयार है, परंतु उनकी आवाज शासन-प्रशासन तक पहुंचने से पहले ही दब जाती है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया है कि गांव में न तो कभी सरपंच को देखा गया और न ही सचिव को। यही एक बड़ी वजह है कि गांव के लोगों का न तो आधार कार्ड बन पा रहा है और न ही राशन कार्ड।

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