Guru Nanak Dev Ji: अंधविश्वास और आडंबर के विरोध में बनाया था नया धर्म, जानिए गुरु नानक देव की जीवनगाथा

मल्टीमीडिया डेस्क। हिंदुस्तान में विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और जातियों का संगम है। सनातन संस्कृति की अच्छाईयों को लेकर अनेक पंथों और संप्रदायों का जन्म हुआ है। इन संप्रदायों के कारण हिंदुस्तान में रीति-रिवाजों और त्यौहारों की समृद्ध परंपरा रही है। ऐसे ही विभिन्न धर्मों के सामंजस्य से हिंदुस्तान में समावेशी, समता मूलक, जातिवाद से परे और सबको साथ लेकर चलने वाले एक धर्म का जन्म हुआ। हिंदूस्तान के सभी धर्मों और उसकी खूबियों का समावेश करने वाला यह धर्म है सिख धर्म।

गुरु नानक देवजी का मनाया जा रहा है 550 वां प्रकाश पर्व

सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव हैं। इस साल गुरु नानक देवजी का 550 वां प्रकाशोत्सव यानी जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। गुरु नानक का जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन 15 अप्रैल, 1469 में रावी नदी के किनारे पंजाब के तलवंडी नामक स्थान पर हुआ था। तलवंडी का नाम गुरु नानक देव का जन्म स्थान होने की वजह से बाद में ननकाना साहिब कर दिया गया। वर्तमान में ननकाना साहिब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है। इस साल गुरू नानक देव जी का प्रकाशोत्सव 12 नवंबर 2019 को मनाया जा रहा है।

गुरु नानक देवजी के थे दो सुपुत्र

गुरू नानक देव जी के पिता का नाम कल्यानचंद या मेहता कालू जी और माता का नाम तृप्ता देवी था। उनकी एक बहन भी थी जिसका नाम नानकी था। गुरु नानक देवजी बाल्यावस्था से बेहद गंभीर स्वभाव के और गहन चिंतन करने वाले थे। उस समय प्रचलित रुढ़ियों का उन्होंने जमकर विरोध किया था। गुरू नानक देवजी का विवाह बटाला की रहने वाली सुलक्षिनी देवी के साथ संपन्न हुआ था। इनके दो बेटे थे जिनका नाम श्रीचंद और लक्ष्मीदास था। गुरू नानक देव जी ने हिंदू धर्म में व्याप्त अंधविश्वास और आडंबरों का सख्त विरोध किया और एक नए धर्म सिख धर्म की स्थापना की। उन्होंने वैरागी की तरह घूमते हुए देश-दुनिया के चुनिंदा धार्मिक स्थलों की यात्रा की।

वे धार्मिक गुरु, समाज सुधारक, चिंतक और देश-दुनिया को नई राह दिखाने वाले एक संत थे। वह एकेश्वरवाद पर विश्वास रखते थे और उनका कहना था कि ईश्वर एक है वह सर्वशक्तिमान है और यही अंतिम सत्य है। उन्होंने अपने अंतिम समय में बाबा लहना को अपना उत्तराधिकार घोषित किया था, जो बाद में अंगद देव के नाम से प्रसिद्ध हुए। गुरू नानक देव जी का देहलोक गमन अविभाजित भारत के करतारपुर में 1539 में हुआ था।

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