फाल्गुन के इस महीने श्रद्धालुओं के जत्थे राजस्थान के सीकर जिले की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं. इन रेलों में दूर से ही दिख रही हैं, नीली-पीली और केसरिया झंडिया, जिन्हें हाथों में थामकर श्रद्धालु नंगे पांव मंदिर की ओर बढ़ते ही जा रहे हैं. भीड़ भक्ति से झूम रही है, कतारों में खड़े लोग भजन गा रहे हैं और भजन को ध्यान से सुनिए तो वह अपने प्रभु श्याम का गुणगान कर रहे हैं. ये श्याम राधा के कृष्ण नहीं हैं, न ही नंद के लाला नंदलाल हैं. देवकी और यशोदा के पुत्र भी नहीं और न ही ये गीता का संदेश देने वाले कर्मयोगी हैं.
श्रद्धालु उन्हें बाबा भी कह रहे हैं और हारे का सहारा भी. वह उनका नाम खाटू वाले श्याम बता रहे हैं. उनकी मंजिल है सीकर से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर एक गांव खाटू. यह गांव फाल्गुन महीने में दुल्हनों की तरह सजा है और भक्त अपने भगवान के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंच रहे हैं. उन्हें हारे का सहारा बता रहे हैं और खुद को धन्य मान रहे हैं बाबा के दर्शन कर लिए. कौन है खाटू वाले श्याम बाबा…
महाभारत से जुड़ा है खाटू श्याम का इतिहास
खाटू बाबा का इतिहास आज से 5000 साल पहले की पौराणिक गाथा से जुड़ा है. महाभारत के युद्ध के दौरान हुई एक घटना से खाटू वाले बाबा श्याम का प्राकट्य माना जाता है. क्या है यह कथा?
जब यह तय हो गया था कि कौरव-पांडव में युद्ध होना ही है. ऐसे में दूर-दूर से राजा-महाराजा अपना पक्ष चुनते हुए सेना समेत युद्ध में शामिल होने पहुंच रहे थे. युद्ध की बात जंगल में रहने वाले एक नवयुवक के कानों तक भी पहुंच रही थी. उसने अपनी मां से युद्ध में जाने की आज्ञा मांगी.
मां ने सहर्ष अनुमति दे दी और जाते-जाते कहा, जा बेटा 'हारे का सहारा' बनना. वह नवयुवक मां की बात से इंच भर भी नहीं डिगता था, क्योंकि वह उसकी गुरु भी थीं. उसने अपने नीले घोड़े पर सवार होने से पहले मां को वचन दिया, जैसा आपने कहा ऐसा ही होगा. 'हारे का ही सहारा' बनूंगा. यह नवयुवक थे महाबली भीम के पौत्र, महाबलशाली घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक, उनकी महान मां थीं मौरवी.
बर्बरीक की दादी हिडिंबा थीं. जिन्होंने पांडवों के वनवास के दौरान भीम से गंधर्व विवाह किया था. इस तरह बर्बरीक पांडव वंशी भी था और हस्तिनापुर के क्षत्रिय परिवार से संबंधित था.
क्यों लिया हारे के सहारे का वचन
दरअसल, कौरव व पांडव के युद्ध में देश-विदेश के जो भी राज्य व राजा थे वह सभी युद्ध में भाग लेने पहुंच चुके थे. राजाओं के साथ उनकी सेना भी उनके साथ युद्ध मे शामिल थीं. इस तरह दोनों दलों की ओर 7-7 अक्षौहिणी सेना हो चुकी थीं. अभी तक द्वारिका ने युद्ध में भाग नहीं लिया था. कौरव-पांडव जब दोनों ही द्वारिका से सहायता मांगने पहुंचे तो परिस्थिति वश कृष्ण पांडव की ओर निहत्थे शामिल हुए और अपनी चतुरंगिणी सेना उन्होंने दुर्योधन को दे दीं. इस तरह कौरवों के पक्ष में 11 अक्षौहिणी सेना हो गई.
मौरवी को था पांडवों की हार का डर
बर्बरीक की मां को लगा था पांडवों की सेना कम है. कहीं युद्ध में उनका पलड़ा कमजोर न पड़े. ऐसे में उसने अपने बेटे से हारने वाले या कमजोर के पक्ष से युद्ध करने का वचन लिया. क्योंकि वह केवल शुरुआती पक्ष ही समझ पा रही थीं, लेकिन, मौरवी ने यह ध्यान नहीं दिया कि अनजाने ही उसने जो वचन लिया है वह महाभारत के युद्ध में किसी काम नहीं आएगा, लेकिन आगे चलकर उनका यही वचन कलयुग में संसार भर के लोगों का कल्याण करेगा. इसी वचन के कारण योद्धा बर्बरीक आज हारे के सहारे बाबा श्याम के तौर पर जाने जाते हैं.
ऐसे मिला श्याम बाबा का नाम
जब बर्बरीक युद्ध क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे, तो रास्ते में एक ब्राह्मण ने उन्हें रोक लिया. ब्राह्मण ने योद्धा का परिचय पूछा. बर्बरीक ने बताया कि मैं पांडव कुलभूषण बलशाली भीम और हिडिम्बा का पोता और उनके पुत्र घटोत्कच का पुत्र हूं. मेरी मां मौरवी हैं जो खुद एक योद्धा हैं और मेरी गुरु भी हैं. मैं इस समय महाभारत के युद्ध में हिस्सा लेने जा रहा हूं. मेरी मां ने मुझे युद्धनीति में प्रशिक्षित किया है और देवताओं से आशीर्वाद भी दिलवाया है. अब मैं उनके आशीष से युद्ध में भाग लेने जा रहा हूं.
बर्बरीक के पास थी दिव्य शक्तियां
ब्राह्मण ने पूछा, योद्धा तुम युद्ध में भाग लेने अकेले जा रहे हो. तुम्हारी सेना कहां है? तुम्हारे अस्त्र-शस्त्र भी अधिक नहीं दिख रहे. यह क्या तुणीर में केवल तीन बाण और बस एक धनुष. ब्राह्मण ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा-योद्धा कुरुक्षेत्र में ऐसा युद्ध होगा, जो फिर कभी नहीं होगा. वहां तुम कैसे अपना पराक्रम दिखाओगे. मेरी मानो लौट जाओ और जीवन का आनंद लो. बर्बरीक ने नम्रता से कहा-मेरी मां के आशीष का अपमान न कीजिए ब्राह्मण देवता. उनके प्रताप से मैं हारे का सहारा बनूंगा. यह तीन बाण साधारण नहीं हैं, दिव्य हैं.
योद्धा बर्बरीक ने दिखाया पराक्रम
इस महाभारत युद्ध के लिए तो मेरा एक ही बाण का काफी है, तीनों बाण चले तो सृष्टि का ही नाश हो जाएगा. यह बाण खुद महादेव ने प्रसन्न होकर दिए हैं. इनकी विशेषता है कि एक बार में लक्ष्य करते ही यह शत्रु समूह का समूल नाश कर देता है. चाहे वह कहीं भी जा छिपा हो. ब्राह्मण ने कहा-तुम तो बातें करते हो. ऐसा होता है तो प्रमाण दिखाओ. उस पीपल के पेड़ के पत्तों को क्या एक ही बाण से वेध सकते हो? इस पर बर्बरीक ने कहा-मैं बातें नहीं करता, प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या जरूरत? लीजिए आप संतुष्टि कर लीजिए. कहकर बर्बरीक ने पीपल की ओर लक्ष्य कर दिया.
…और आश्चर्य में पड़ गए ब्राह्मण
बर्बरीक ने जैसे ही बाण संधान किया. ऐसा लगा कि लाखों बाण प्रकट होकर पीपल के पेड़ के पत्तों को बेधने लगे हों. यह देखकर ब्राह्मण ने एक पत्ते को चुपके से अपने पैर के नीचे छिपा लिया. सारे पत्तों को बेध लेने के बाद बाण ब्राह्मण के पैरों की ओर बढ़ा और उसके पंजों को बेधने लगा.
बर्बरीक चीखा-मेरे लक्ष्य से पैर हटा लीजिए ब्राह्मण देव, नहीं तो यह आपके चरण बेध देगा. इतना सुनते ही ब्राह्मण ने पैर हटा लिया और बाण ने उस आखिरी पीपल के पत्ते को भी बेध दिया.
ब्राह्मण ने मांगा शीश दान
यह देख ब्राह्मण वाह-वाह कर उठे. उन्होंने बर्बरीक के बल-कौशल की प्रशंसा की और कहा कि तुम बहुत वीर हो, क्या इतने ही दानी भी हो. बर्बरीक ने कहा, जो योद्धा दानी नहीं, वह योद्धा भी नहीं. आप दान मांगकर भी देख लीजिए. मैं आपको वचन देता हूं. तब ब्राह्मण ने उनसे शीशदान मांग लिया. यह सुनकर बर्बरीक चौंका. उसने कहा-वचन देने के बाद पीछे तो नहीं हटूंगा, लेकिन आप अपना वास्तविक स्वरूप दिखाइए, क्योंकि कोई ब्राह्मण ऐसा दान नहीं मांग सकता.
तब श्रीकृष्ण ने दिए दर्शन, दिए कई वरदान
बर्बरीक की प्रार्थना पर ब्राह्मण वेशधारी श्रीकृष्ण ने असली स्वरूप में आकर उन्हें दर्शन दिए और उसके दान, युद्ध कौशल की मुक्त कंठ से प्रशंसा की. बर्बरीक ने कहा-अब तो मैं वचन दे चुका, लेकिन मैं महाभारत का युद्ध भी देखना चाहता था. यह इच्छा न पूरी होने का दुख है. और आपने मेरा शीश क्यों मांग लिया? इस तरह तो मैं अपने पिता-पूर्वजों के किसी काम भी नहीं आ सका. तब श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि तुम सृष्टि के अंत तक अमर रहोगे. तुम्हारे बाण से बिंधा मेरा यह पैर ही अब मेरी मृत्यु का कारण बनेगा जो मेरा प्रायश्चित भी होगा. तुम अब मेरे ही नाम से खाटू श्याम कहलाओगे.
इसके बाद बर्बरीक की इच्छा के अनुसार श्रीकृ्ष्ण ने उनके शीष को अमृत से सींचकर कुरुक्षेत्र के निकट एक ऊंची पहाड़ी पर बांस का तिपाया बनाकर उस पर रख दिया, ताकि बर्बरीक पूरा महाभारत का युद्ध अपनी आंखों से देख सके. शीश को खाट पर रखे जाने के कारण ही उनका नाम 'खाटू वाले श्याम' प्रसिद्ध हुआ.