नक्सलियों के चंगुल से पुलिस कर्मी को वापस लेकर आई पत्नी

बीजापुर. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बीजापुर (Bijapur) में एक पुलिस (Police) कर्मी की पत्नी (Wife) ने नक्सलियों (Naxalite) के चंगुल से अपने पति को छुड़ाकर वापस लाया. मंदिर दर्शन के लिए गए पुलिस कर्मी का नक्सलियों ने पिछले सप्ताह अपहरण कर लिया था. तब से वे अपने कब्जे में पुलिस जवान को रखे थे. बीते 11 मई को नक्सली जनअदालत लगाकर जवान के जीवन का फैसला करने वाले थे. इसकी जानकारी जवान की पत्नी को लगी और वो किसी तरह उस गांव में पहुंची जहां नक्सलियों की जन अदालत लगने वाली थी. बताया जा रहा है कि ग्रामीणों के सकारात्मक और मानवीयतापूर्ण निर्णय के बाद पुलिस कर्मी को नक्सलियों द्वारा छोड़ दिया गया. पत्नी जवान को लेकर वापस लौटी.

बीजापुर के एसपी कमलोचन कश्यप ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि पुलिस कर्मी सकुशल वापस आया है. किन परिस्थितियों में उसका अपहरण नक्सलियों ने किया था, उसकी जांच की जाएगी. पुलिस विभाग में इलेक्ट्रिशियन पद पर पदस्थ संतोष कट्टम का अपहरण नक्सलियों द्वारा किया गया था. इस घटना को कवरेज करने वाले बीजापुर के पत्रकार रंजन दास ने बताया कि बीते 11 मई को नक्सलियों द्वारा लगाई गई जनअदालत में लगभग एक से डेढ़ हजार ग्रामीण पहुंचे थे.

मंदिर दर्शन के दौरान अपहरण
बीजापुर के भोपालपट्नम में पदस्थ पुलिस कर्मी संतोष कट्टम मूलत: सुकमा के जगरूगुंडा का रहने वाला है. संतोष द्वारा मीडिया को दी गई जानकारी के मुताबिक बीते 4 मई को वह गोरना मंदिर में आयोजित मेले के दौरान दर्शन के लिए गया हुआ था, जहां से नक्सलियों ने उसका अपहरण कर लिया.

मौत के साये में गुजरे 7 दिन

मीडिया से चर्चा में संतोष ने बताया कि मंदिर दर्शन के बाद वह बाहर साथ आए मित्र के इंतजार में था. इसी बीच ग्रामीण वेषभूषा में मौजूद नक्सलियों को उस पर शक हुआ. वे उसे मेले से दूर लेकर गए. पूछताछ की और गाड़ी की तलाशी ली, जिसमें टी-शर्ट और आईकार्ड से उसकी पहचान हो गई. फिर नक्सलियों ने फौरन उसके हाथ बांध दिए. बस तब से लेकर रिहाई तक उसकी आंखों पर पट्टी ही बंधी हुई थी. पिछले सात दिनों तक उसने कितने गांवों को पार किया, कितनी पहाड़ियां चढ़ी, कितने पेड़ों के नीचे सोया, उसकी कोई गिनती नहीं. रात के अंधेरे में एक गांव से दूसरे गांव नक्सली उसे अपने साथ लेकर चलते. खाने को चिड़ियों का मांस, सूखी मछली ही उसे मिली. पूरे सात दिन वह कई गांव बदलता रहा, लेकिन किसी भी मकान या झोपड़ी में उसे ठहराया नहीं गया. पेड़ों के नीचे दिन और रात कटती, हाथ पीछे से बंधे होते और 24 घंटे हथियारबंद नक्सलियों का सख्त पहरा था.

इस तरह कब्जे से छूटा जवान
बीजापुर के पत्रकार रंजन दास बताते हैं कि पुलिस कर्मी संतोष कट्टम ने मीडिया से चर्चा में बताया कि लगातार सात दिनों तक अपने साथ जंगलों में घुमाने के बाद नक्सली बीते सोमवार को जनअदालत लगाकर उसका निर्णय करने वाले थे. रंजन कहते हैं कि पुलिस कर्मी की पत्नी सुनीता कट्टम को कहीं से सूचना मिली कि नक्सली उनके पति को बीहड़ में रखे हैं. इसके बाद वो किसी तरह वहां पहुंची. साथ में बीजापुर के कुछ पत्रकार भी गए. नक्सलियों की आयोजित जनअदालत में 2 घण्टे तक संतोष के साथ सवाल जबाव किया गया.  जिसके बाद जवान द्वारा जब यह आश्वासन दिया गया कि वह अब पुलिस की नौकरी नहीं करेगा और खेती बाड़ी कर जीवन यापन करेगा, उसके बाद उसे पत्नी सुनीता कट्टम और बेटी भावना कट्टम के समक्ष छोड़ा गया.

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