स बार नहीं होगी बैल दौड़ स्पर्धा…पोला पर्व पर कोरोना का असर

हर साल बैल दौड़ प्रतियोगिता में आसपास के गांवों के लोग भी आते थे, जुटती थी खासी भीड़ पर इस साल कहीं कोई आयोजन नहीं

छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पर्वों में से एक भाद्रपद अमावस्या को मनाया जाने वाला पोला पर्व इस बार कोरोना महामारी के चलते 18 अगस्त को सादगी से मनाया जाएगा। हर साल बैल दौड़ प्रतियोगिता में आसपास के गांवों में बैलों का श्रृंगार करके किसान अपने साथ लाते थे और बैलों की दौड़ होती थी। इसे देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जुटती थी। इस बार बैल दौड़ को कोरोना के चलते स्थगित कर दिया गया है। बैलों की पूजा के बाद बच्चे मिट्टी के बैल दौड़ाएंगे। इधर पर्व की पूर्व संध्या पर बाजारों में मिट्टी के बैल बिकने लगे हैं। पंडित धनेश्वर प्रसाद शास्त्री ने बताया कि पोला पर्व के दौरान खरीफ फसल की तैयारी हो चुकी होती है, खेतों में निंदाई, गुड़ाई का काम निपट जाता है। ऐसी मान्यता है कि पोला पर्व के दिन अन्न माता गर्भ धारण करती हैं, धान के पौधों में दूध भरता है। बैलों को सम्मान देने के उद्देश्य से किसान पोला पर्व पर बैलों की पूजा करते हैं। रात्रि में गांव के पुजारी, मुखिया, गांवों की सीमा में स्थापित देवी-देवता की पूजा करते हैं, पूजा में वह व्यक्ति नहीं जाता जिसकी पत्नी गर्भवती हो।मान्यता है कि कान्हा जब छोटे थे और वासुदेव-यशोदा के यहां रहते थे, तब कंस ने कई बार कई असुरों को उन्हें मारने भेजा था। एक बार कंस ने पोलासुर नामक असुर को भेजा था, जिसे भी कृष्ण ने मार दिया था। वह दिन भाद्रपद अमावस्या का था इसलिए इसे पोला कहा जाता है।

इन व्यंजनों का लगेगा भोग
पुरानी बस्ती निवासी अमरीका पटेल ने बताया कि देवी, देवता और बैलों को गुड़हा, चीला, अनरसा, सोहारी, चैसेला, ठेठरी, खुरमी, बरा, मुरकू, भजिया, मूठिया, गूजिया, तसमई आदि छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा इसलिए सोमवार को ही सभी व्यंजन बना लिए।

बैल 50 से 90 रुपए तक
पोला त्यौहार के पहले बाजार में रौनक दिखाई दे रही है। नंदी बैल, चुकिया पोरा और अन्य सामान की अच्छी बिक्री हो रही है। बाजार में 50 रुपए से लेकर 90 रुपए तक नंदी बैल बिक रहे हैं। वहीं लड़कियों की खेल सामग्री चुकिया 80 से लेकर 150 रुपये सेट तक बिक रही है।

बैलों का करेंगे शृंगार
लटुवा के किसान किशोर यादव ने बताया कि पोला पर गौ माता और बैलों को स्नान कराकर शृंगार करेंगे। सींग और खुर यानी पैरों में माहुर, नेल पॉलिश लगाएंगे, गले में घुंघरू, घंटी, कौड़ी के आभूषण पहनाकर पूजा करेंगे लेकिन उन्हें दौड़ के लिए कोठों से बाहर नहीं निकालेंगे।

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