बिलासपुर. जरहागांव तहसीलदार द्वारा जारी ऋचा रुपाली जोगी के अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र विवाद में नया मोड़ आ गया है। एक ओर जिला सत्यापन समिति ने आज मैराथन बैठक कर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया और दूसरी ओर श्रीमती जोगी हाईकोर्ट पहुंच गई। उन्होंने रिट याचिका दाखिल कर मुंगेली कलेक्टर व जिला स्तरीय जाति छानबीन समिति के नोटिस को रद्द करने और अपने जाति संबंधी प्रमाणपत्र को प्रभावित करने वाली किसी भी कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका में उन्होंने कहा है कि प्रशासन उन्हें मरवाही उप-चुनाव लड़ने से रोकने के लिये अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहा है। इस मामले में उनकी जाति प्रमाणपत्र की वैधता को चुनौती देते हुए शिकायत करने वाले आदिवासी नेता संतकुमार नेताम हाईकोर्ट में एक कैवियेट पहले ही दाखिल कर रखी है। वहीं दूसरी ओर उन्होंने मुंगेली कलेक्टर से रजिस्ट्री कार्यालय बंद होने से दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने का हवाला देते हुए 10 दिनों का समय मांगा है।
अधिवक्ता गैरी मुखोपाध्याय के माध्यम से दाखिल याचिका में छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जे) के प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व विधायक अमित जोगी की पत्नी व पूर्व मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी की बहू ऋचा जोगी ने कहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने गैर कानूनी ढंग से जिला स्तरीय छानबीन समिति को जाति प्रमाणपत्र निरस्त करने का अधिकार दे दिया है। इसी समिति की ओर से मुंगेली जिले के कलेक्टर ने 29 सितम्बर को एक शिकायत के आधार पर उनके गोंड आदिवासी जाति प्रमाण पत्र की जांच के लिये नोटिस दिया है। यह नोटिस उनके पते पर नहीं भेजा गया । मीडिया से उन्हें इसकी जानकारी मिली। इसके बावजूद निर्धारित तिथि 8 अक्टूबर को उनके भाई ऋषभ साधू की ओर से कलेक्टर के समक्ष पहुंचकर जाति प्रमाण पत्र के दस्तावेजों के साथ स्वयं उपस्थित होने के लिये समय मांगा गया। कलेक्टर मुंगेली द्वारा 12 अक्टूबर की तारीख तय की गई। इस दौरान जिला पंजीयक कार्यालय कोरोना संक्रमित कर्मचारी पाए जाने के कारण बंद कर दिया गया है, जिसके चलते उन्हें आवश्यक अन्य दस्तावेज प्राप्त नहीं हुए हैं। उन्होंने जिला स्तरीय समिति से 7 दिन का समय फिर मांगा है। याचिकाकर्ता ने कहा कि उनके परिवार की गोंड जाति विगत 50 वर्षों से सरकारी रिकॉर्ड में प्रमाणित है। उनके परिवार के अनेक लोग आदिवासी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी कर रहे हैं। मुंगेली कलेक्टर व जिला स्तरीय जाति छानबीन समिति जानबूझकर उनके प्रमाण पत्र को निरस्त करना चाहती है, ताकि वे मरवाही से चुनाव नहीं लड़ सकें।याचिकाकर्ता ऋचा जोगी ने 24 सितम्बर को गठित जिला स्तरीय जाति छाबनीन समिति के संशोधन आदेश को निरस्त करने और इस आदेश के आधार पर जिला कलेक्टर मुंगेली द्वारा की जा रही समस्त कार्यवाही पर मामले की अंतिम सुनवाई तक रोक लगाने की मांग की है।
क्या है मामला जरहागांव तहसीलदार द्वारा 17 जुलाई को ऋचा रुपाली जोगी का अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी किया गया है, इसके खिलाफ आदिवासी नेता संतकुमार नेताम ने शिकायत की है, श्री नेताम ने विभिन्न मुद्दों पर आपत्ति जताते हुए श्रीमती जोगी का जाति प्रमाणपत्र रद्द करने की मांग की है। इस पर मुंगेली जिला प्रशासन ने श्रीमती जोगी को नोटिस जारी करते हुए 8 अक्टूबर तक जवाब प्रस्तुत करने कहा था, परन्तु 8 अक्टूबर को वे स्वयं जिला स्तरीय जाति छानबीन समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं हुईं, उनके भाई ऋषभ जोगी उनकी ओर से प्रस्तुत हुए, उन्होंने समिति को दस्तावेज दिए व अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए 12 अक्टूबर तक का समय मांगा था।
नेताम ने दाखिल की है केवियेट ऋचा जोगी के आदिवासी जाति प्रमाणपत्र की वैधता को लेकर शिकायत करने वाले संतकुमार नेताम ने अधिवक्ता संदीप दुबे और सुदीप श्रीवास्तव के माध्यम से पहले ही कैवियेट दाखिल कर रखा है। नेताम के अधिवक्ता संदीप दुबे ने कहा है कि अभी ऋचा जोगी की याचिका सिर्फ लगी है, सुनवाई होने पर हम अपना पक्ष रखेंगे। कलेक्टर से मांगा 10 दिनों का समय मुंगेली जिला स्तरीय जाति छानबीन समिति द्वारा श्रीमती जोगी को नोटिस देकर 12 अक्टूबर तक आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने कहा गया था, इसके जवाब में सोमवार को अपना जवाब भेजा। इसमें उन्होंने कहा है कि 8 अक्टूबर को समिति ने उनसे आवेदन की मूल प्रति मांगी थी, उन्होंने चाइस सेंटर के माध्यम से आनलाइ आवेदन किया था, उनके भाई ने मुंगेली कलेक्टर से आनलाइ आवेदन और दस्तावेज उपलब्ध कराने कहा था, परन्तु ये दस्तावेज उन्हें प्राप्त नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा है कि समिति द्वारा भेजे गए पत्र में 1950 से पहले का राजस्व दस्तावेज, 2 जून 1940 के बिक्रीनामे की मूलप्रति मांगी गई है, सभी मूल दस्तावेज बिलासपुर रजिस्ट्री कार्यालय में उपलब्ध हैं, उक्त कार्यालय एक कर्मचारी के कोरोना पाजिटिव पाए जाने के कारण 11 अक्टूबर तक बंद था, जिसकी वजह से उन्हें दस्तावेज नहीं मिल पाए हैं। इसलिए दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए उन्हें 7 दिन का और समय दिया जाए। उन्होंने इस बीच पड़ने वाली छुट्टियों का हवाला देते हुए कहा है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार उन्हें कम से कम 10 दिन का समय अपना पक्ष रखने के लिए दिया जाना चाहिए। उन्होंने अपने 2 माह के बच्चे और कोरोना संक्रमण को देखते हुए कोरोना फ्री माहौल में सुनवाई का अवसर देने की मांग भी की है।
