छत्तीसगढ़ में BJP ने ‘नए चेहरे’ पर क्यों लगाया दांव……..

रायपुर. छत्तीसगढ़ बीजेपी (BJP) के नए प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय (Vishnu Deo Sai) के सामने मुश्किलों की लंबी फेहरिस्त है. विधानसभा चुनाव 2023 में बीजेपी की खोई हुई जमीन वापस दिलाने की, चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को रिचार्ज करने की, तथाकथित कद्दावर और बड़े नेताओं को एकजुट करने की, पुराने चेहरे से थक चुके लाखों कार्यकर्ताओं को नया चेहरा पर विश्वास जताने की और ना जाने ऐसी कितनी अनगिनत चुनौती अब विष्णुदेव साय के सामने खड़ी हैं. विष्णुदेव साय अध्यक्ष बनने से पहले ही छत्तीसगढ़ की राजनीति को बखूबी जानते-समझते और निभाते रहे हैं. साय बेहतर तरीके से समझते हैं कि 2018 विधानसभा चुनाव में 15 सालों तक शासन करने वाली बीजेपी महज 15 सीटों पर कैसे और क्यों सिमट गई और उप चुनाव के बाद 15 से भी कम 14 सीटें पर कैसे आ गई.

विष्णुदेव साय ने कभी खुलकर बोला नहीं, मगर वे जानते हैं सत्ता के बाहर और भीतर  bjp की खिचड़ी कैसे पक रही हैं. वे समझते हैं कि दर्जनों लोग उनकी कमियां निकालने, उनको हतोत्साहित करने, उनका नकारात्मक फीडबैक तैयार करने की तैयारी कर चुके हैं, बावजूद इसके विष्णुदेव साय उम्मीदों के पहाड़ के सामने राई समान हौसला लिए खड़े हो चुके हैं. उम्मीदों का पहाड़ इसलिए भी क्योंकि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार पहाड़ से बड़े बहुमत के साथ पूरे आक्रमक तेवर के साथ धरातल पर डटी हुई है. सत्ता पक्ष के आक्रामक तेवर के सामने विपक्ष अलग-थलग दिखाई देने लगा है.

हिट फार्मूले से एक साल में ही परहेज पर उठे सवाल

2014 लोकसभा का चुनाव याद कर लीजिए कि कैसे देशभर में पीएम मोदी की आंधी चली थी. बीजेपी ने केंद्र की सत्ता में वापसी की थी.chhattisarh बीजेपी का स्कोर 11 में से 10 रहा था. छत्तीसगढ़ के 11 संसदीय सीटों में से दुर्ग सीट छोड़कर बाकी 10 सीटों पर बीजेपी ने शानदार तरीके से कब्जा जमाया था. ठीक 5 साल बाद 2019 का लोकसभा चुनाव में बीजेपी आलाकमान ने तय किया कि प्रदेश के किसी भी मौजूदा सांसद को टिकट नहीं दिया जाएगा. इस फैसले के बाद तत्कालीन वरिष्ठ सांसद रमेश बैस, केंद्रीय मंत्री विष्णुदेव साय, डॉ. रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह समेत तमाम दिग्गजों के सपनों को हवा में उड़ा दिया था जो फिर से चुनावी दंगल लड़ने कसरत शुरू कर चुके थे. बीजेपी ने नए चेहरे के साथ नए फार्मूले से चुनावी ताल ठोका, क्योंकि 2018 विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ की जनता ने बीजेपी के रटे-रटाए दिखे-दिखाएं चेहरे को सिरे से नकार दिया था.

2019 लोकसभा चुनाव का परिणाम आया, नए और युवा चेहरों के साथ बीजेपी 11 में से 9 सीटें जीतने में कामयाब हुई. बीजेपी का फार्मूला सुपरहिट साबित हुआ. राजनीति के जानकारों से लेकर सियासतदानों तक को लगने लगा यह छत्तीसगढ़ बीजेपी में परिवर्तन की मजबूत शुरुआत हो गई है. मगर उसके बाद ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला कि परिवर्तन के कारवां को आगे बढ़ाया जा सके. चाहे उपचुनावों में जिम्मेदारी देने की बात हो या नगरी निकाय चुनाव में पर्यवेक्षक बनाने की या पंचायत चुनाव में नेतृत्व की या कुछ कागजी आंदोलन में नेतृत्व करने की बात हो उसी पुराने ढर्रे पर बीजेपी उन्हीं चेहरों के साथ लौट आई थी. उसके बाद विष्णुदेव साय को तीसरी बार प्रदेश अध्यक्ष बनाना बताने के लिए काफी है कि ‘बदलाव का एक अध्याय’ था जो समाप्त हो चुका है. अब किताब वही पुरानी पढ़नी होगी. बीजेपी ने अपने सुपर हिट फार्मूले को दरकिनार तो किया मगर पुराने पर भरोसा कैसा रिजल्ट देगा, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा.

अजीत जोगी को हराकर सत्ता तक पहुंची थी बीजेपी

छत्तीसगढ़ के कुनकुरी में जन्मे विष्णुदेव साय जनसंघ के जमाने से ही RSS से जुड़े रहे हैं. मोदी-1.0 में वे केंद्रीय राज्य मंत्री बने. 1999 से 2014 तक वे लगातार सांसद रहे. दो बार पार्टी के पूर्व में अध्यक्ष भी रह चुके हैं. छत्तीसगढ़ में 2003 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्तासीन हुई थी. तात्कालिक बीजेपी दिवंगत अजीत जोगी जैसे चेहरे को मात देकर सत्ता तक पहुंची थी. मगर छत्तीसगढ़ बीजेपी की असली परीक्षा 2008 विधानसभा चुनाव में थी. तब विष्णुदेव साय अध्यक्ष थे और बीजेपी सत्ता में वापसी में कामयाब हुई. साय पहली बार 31 अक्टूबर 2006 से 9 मई 2010 तक अध्यक्ष रहे. दूसरी बार 21 जनवरी 2014 से 15 अगस्त 2014 तक अध्यक्ष रहे और बीजेपी प्रदेश की 11 में से 10 संसदीय सीटें जीतने में कामयाब रही थी. अब तीसरी बार अध्यक्ष बनाया कर उन्हें 2023 का टारगेट दिया गया है.

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