अरे, तुम्हारे पास सबकुछ तो है। इतनी अच्छी जॉब, फैमिली। फिर काहे का डिप्रेशन? पॉजिटिव सोचा करो।’
‘अरे यार, वह इतना फेमस था। कामयाब था। पैसेवाला था। फिर क्या ज़रूरत थी आत्महत्या करने की?’
किसी के डिप्रेशन में होने या तनाव में खुदकुशी कर लेने पर अमूमन लोग ऐसे ही रिऐक्ट करते हैं। कोई हैरान होता है, तो पॉजिटिव सोचने की सलाह देता है। असल में यह समझने की ज़रूरत है कि डिप्रेशन या मानसिक रोगों का शोहरत, पैसा, कामयाबी से कोई लेना-देना नहीं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, हर चार में से एक इंसान किसी न किसी तरह की मानसिक समस्या से गुज़र रहा है। हर 40 सेकंड में एक आदमी आत्महत्या कर रहा है। इसके बावजूद, हमारे समाज में मेंटल हेल्थ को लेकर जागरूकता नहीं है। लोगों को लगता है कि एक कामयाब या पैसेवाले इंसान को मानसिक रोग भला कैसे हो सकता है? ऐसा हाल ही में ऐक्टर सुशांत सिंह राजपूत के मामले में भी देखने को मिला।
चीज़ों से नहीं बहलता दिल
पांच साल तक डिप्रेशन और बायपोलर डिसऑर्डर का दर्द झेलने वाली जानी-मानी ऐक्ट्रेस शमा सिकंदर कहती हैं कि डिप्रेशन बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड बीमारी है। लोग कहते हैं कि किसी ने धोखा दिया या दिल टूट गया, तो डिप्रेशन हो गया। मामला इतना आसान नहीं है। ये आपके बचपन के किसी ज़ख़्म, मोलेस्टेशन, परवरिश, जिंदगी के प्रति नजरिया, किसी भी वजह से हो सकता है।
शमा अपने अनुभवों का हवाला देती हैं, ‘मैं घंटों रात में रोती रहती थी। सो नहीं पाती थी। किसी से बात करने का मन नहीं करता था। हालांकि, मेरे पास कोई कारण नहीं था। मैं स्टार थी। मेरे पास सबकुछ था, पर सुकून नहीं था। मैं किसी को बता नहीं पाती थी, क्योंकि घर में सबसे बड़ी हूं और सबके हिसाब से बहुत स्ट्रॉन्ग हूं, तो मुझे ऐसा कुछ कैसे हो सकता है!’
अपनी तकलीफ़ किसी से साझा करने के बाद उन्हें जो सुनने को मिलता, वह कुछ यूं होता, ‘कोई फिल्म देख लो या बाहर चली जाओ, मूड ठीक हो जाएगा।’ बक़ौल शमा लोग यह समझ नहीं पाते कि इसकी वजह हमारे दिमाग़ की नसों में केमिकल इंबैलेंस होता है, जो दवा से ही दूर होगा, मबहलाव से नहीं। शमा ने डिप्रेशन में आत्महत्या करने की भी कोशिश की। पर उन्हें घरवालों ने बचा लिया। हालांकि इसके बाद घरवालों का शमा से कहना था,, ‘तुम ऐसा कैसे कर सकती हो। तुम तो इतनी स्ट्रॉन्ग हो।’
शमा अपना दर्द साझा करते हुए कहती हैं, ‘आप यह नहीं सोचते कि कोई ऐसा क्यों करेगा? कुछ तो तकलीफ़ होगी। डिप्रेशन या बायपोलर आपको अंदर से हिला देता है। आपमें जीने की इच्छा नहीं रहती। जब आप यह समझेंगे, खुद पर ध्यान देंगे, इलाज कराएंगे, तभी इससे निकल पाएंगे।’
इसकी भी दवा है
‘कभी ख़ुशी, कभी ग़म’ और ‘दीवानापन’ जैसी फ़िल्मों और क्योंकि ‘सास भी कभी बहू थी’, ‘कसौटी ज़िंदगी की’ जैसे शोज़ के ऐक्टर विकास सेठी भी डिप्रेशन से जूझ चुके हैं। विकास के मुताबिक़, ‘जब मुझे डिप्रेशन हुआ, तो मेरे पास सबकुछ था : पैसा, अच्छा काम, प्रसिद्धि। इसलिए आपको सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि डिप्रेशन है। डिप्रेशन है, तो आप डॉक्टर से मिलें और नियम से दवा लें। यह ठीक हो जाता है। जैसे आपको बुखार होता है, खांसी होती है, तो आप दवा लेते हैं, वैसे ही इसकी भी दवा है।’
विकास आगे कहते हैं, ‘दिक़्क़त यह है कि हमारे समाज में जैसे ही आप कहते हैं कि मुझे डिप्रेशन है, लोग आपका मज़ाक़ बनाने लगते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। इसी वजह से लोग बोलते नहीं हैं। हमारे यहां यह अवेयरनेस नहीं है। मुझे लगता है कि सरकार को इसके लिए जागरूकता अभियान चलाना चाहिए, क्योंकि लोग मर रहे हैं। अभी सीबीआई के एक्स डायरेक्टर ने आत्महत्या कर ली। आप कहेंगे कि उनकी तो इतनी अच्छी ज़िंदगी जिंदगी थी या सुशांत को ही लीजिए, वह इतना अच्छा काम कर रहा था, तो डिप्रेस कैसे हो सकता है। लेकिन फिर भी वह डिप्रेशन में थे। डिप्रेशन किसी को भी हो सकता है, यह समझना बहुत ज़रूरी है।’
पूछो, क्या तुम ठीक हो?
कुछ बरस पहले डिप्रेशन से गुजरने वाली टीवी ऐक्ट्रेस स्नेहा वाघ भी मेंटल हेल्थ के प्रति लोगों के नज़रिए में बदलाव को ज़रूरी मानती हैं। बकौल स्नेहा, ‘किसी को मेंटल इशू होने पर लोग सबसे पहले यही कहते हैं कि पागल है क्या? लेकिन ऐसा नहीं होता। इसमें लोग खुद से जंग लड़ रहे होते हैं। वे अपनी ज़िंदगी से ही ख़ुश नहीं होते। मैं भी इस लड़ाई से गुजरी हूं। एक वक़्त पर मैंने हार भी मान ली थी, लेकिन फिर मुझे अहसास हुआ कि क्यों हम नेगेटिव चीज़ों को ही तवज्जो देते हैं।’
ऐसे मौक़ों पर परिवार की अहमियत को रेखांकित करते हुए स्नेहा कहती हैं, ‘मुझे इससे निकलने में समय लगा, लेकिन अब मैं बाहरी ख़ुशियों पर निर्भर नहीं रहती हूं। ऐसे वक़्त में परिवार बहुत अहमियत रखता है। परिवार में अगर आपको लगता है कि कोई सदस्य दुखी या डिप्रेस है, तो ख़ुद जाकर पूछो कि तुम ठीक हो? इंतज़ार मत करो कि वह आकर बताएगा।’
डॉक्टर से परहेज़ है परिवारवालों को
अपोलो टेलीहेल्थ की क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट तबस्सुम शेख़ एक रिसर्च के हवाले से कहती हैं, ‘80 पर्सेंट लोगों को पता है कि उन्हें मानसिक समस्या है। लेकिन 10 पर्सेंट ही डॉक्टर के पास जाते हैं। ज़्यादातर को इसमें शर्म महसूस होती है। फिर, आसपास के लोग भी उन्हें पीछे खींचते हैं। वे कहते हैं कि अरे, तुम्हें स्ट्रॉन्ग होना चाहिए, बजाय यह कहने के कि तुम्हें मेडिकल हेल्प लेनी चाहिए।’
