रायपुर. राजधानी रायपुर की सड़कों पर आज से एक दशक पहले तक हजारों की संख्या में रिक्शा चलते थे, लेकिन अब पैडल रिक्शा इतिहास बनने की तरफ चल पड़े हैं। शहर में पहले एक दर्जन से ज्यादा दुकानें थीं, जिनमें हर माह दो सौ से ज्यादा रिक्शा बिक जाते थे। आज एक ही दुकान बच गई है, जिसमें माहभर में एक भी नहीं बिक पाता है। आज ई-रिक्शा के कारण इनका कारोबार चौपट हो गया है और इनकी संख्या भी अब 20 हजार से सिमटकर दो हजार तक पहुंच गई है। जल्द ही यह संख्या में भी सिमट जाएगी और राजधानी में रिक्शा ही नजर आने बंद हो जाएंगे। वर्तमान में जो रिक्शे चल रहे हैं, वे सब बरसों पुराने हैं। बदलते समय के साथ अब राजधानी में आटो के बाद ई-रिक्शा की भरमार हो गई हैं। इनके आने से सबसे बड़ा नुकसान रिक्शा चलाने वालों को हुआ है। रिक्शा चालकों को अब सवारियां भी बमुश्किल मिल पाती हैं। बहुत कम लोग ही रिक्शा में बैठना पसंद करते हैं। शहर में कभी-कभार ही कहीं पर रिक्शा में बैठे लोग नजर आते हैं। ज्यादातर सवारियां ई-रिक्शा या फिर आटाे में सफर करना पसंद करती हैं।
50 से ज्यादा गैरेज शहर में पहले ज्यादातर रिक्शा चालक खुद का रिक्शा न खरीदकर किराए पर लेकर चलाते थे। रायपुर में ओडिशा से आए उड़िया समाज के लोगों ने ही यहां पर रिक्शा चलाना प्रारंभ किया था। शहर में पंडरी में माता, निरंजन, संतोषी, बघेल, हिंद सहित कई नामों से बड़े-बड़े गैरेज थे, जिनमें हजारों की संख्या में रिक्शा रहते थे। इसी के साथ शहर में छोटे-छोटे भी बहुत से गैरेज थे। रिक्शा चालक कालिया यादव ने बताया, वे 30 साल से ज्यादा समय से रिक्शा चला रहे है। पहले गैरेजों से महज 20 रुपए में 24 घंटे के किराए पर रिक्शा मिलता था, लेकिन बाद में यह बंद हो गया तो मैंने भी अपना रिक्शा ले लिया। आज भी मैं रिक्शा चलाता हूं।
सामान ले जाने का काम ज्यादा शहर में जाे रिक्शा चल रहे हैं, उनको सवारियां कम ही मिलती हैं। ज्यादातर रिक्शा चालकों को दुकानों से सामान एक दुकानदार से दूसरे दुकानदार के पास ले जाने का काम मिलता है, या किसी दुकान से कोई ग्राहक कुछ लेता है तो वह रिक्शा कर लेता है। रिक्शा चालक विजय कुमार बताते हैं, आज से 20 साल पहले भी दो से ढाई सौ का धंधा होता था, आज भी करीब इतना ही धंधा हो जाता है, लेकिन पहले महंगाई इतनी नहीं थी, तब कुछ पैसा बच भी जाता था, लेकिन अब इतनी कमाई से गुजारा नहीं हाे पाता। एक रिक्शा भी नहीं बिकता शहर में कभी एक दर्जन से ज्यादा साइकिल स्टोर में रिक्शा बिकता था, लेकिन आज तात्यापारा में एकमात्र चंद्रकात साइकिल स्टोर में ही रिक्शा बिकता है। इस दुकान के संचालक चंद्रकांत सातपुते बताते हैं, पहले हर माह 15 से 20 रिक्शे बिक जाते थे। शहर में और भी जो दुकानें थीं, उनमें भी इतने रिक्शे आसानी से बिक जाते थे, लेकिन आज शहर में उनके अलावा कोई दुकान नहीं बची है। श्री सातपुते बताते हैं, आज तो माहभर में एक रिक्शा भी मुश्किल से बिकता है। वह भी रायपुर के बाहर के शहर के लोग आकर ले जाते हैं। आज रिक्शा की कीमत 15 हजार रुपए है, पहले यह छह से आठ हजार तक मिल जाता था।
